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ध्यांन हैं विधी : हिरण वैष्णव

*ध्यांन* हैं विधी : हिरण वैष्णव - अमदावाद
प्रश्न: ध्यान किसे कहते हैं, और उसे करने की क्या विधि है?*
निर्विचार चेतना ध्यान है। और निर्विचार के लिए विचारों के प्रति जागना ही विधि है।
विचारों का सतत प्रवाह है मन। इस प्रवाह के प्रति मूर्च्छित होना - सोये होना, अजाग्रत होना -- साधारणतः हमारी स्थिति है। इस मूर्च्छा से पैदा होता है तादात्म्य। "मैं" ही मन हूं मालूम होने लगता है।
जागें और विचारों को देखें। जैसे कोई राह चलते लोगों को किनारे खडे़ होकर देखे। बस, इस जागकर देखने से क्रांति घटित होती है। विचारों से स्वयं का तादात्म्य टूटता है। इस तादात्म्य - भंग के अंतिम छोर पर ही निर्विचार - चेतना का जन्म होता है।

*ऐसे ही जैसे आकाश में बादल हट जावें तो आकाश दिखाई पड़ता है। विचारों से रिक्त चित्ताकाश ही स्वयं की मौलिक स्थिति है। वही समाधि है।*

*ध्यान है विधि।*
*समाधि है उपलब्धि।*

लेकिन, ध्यान के संबंध में सोचें मत। ध्यान के संबंध में विचारना भी विचार ही है उसमें तो जायें। डूबें। ध्यान को सोचें मत -चखें।

मन का काम है सोना और सोचना, जागने में उसकी मृत्यु है। और ध्यान है जागना। इसलिए मन कहता है, "चलो -- ध्यान के संबंध में ही सोचें!" यह उसकी आत्मरक्षा का अंतिम उपाय है। इससे सावधान होना। सोचने की जगह , देखने पर बल देना।

*विचार नहीं , दर्शन --- बस यही मूलभूत सूत्र है। दर्शन बढ़ता है, तो विचार क्षीण होते हैं। साक्षी जागता है, तो स्वप्न विलीन होता है। ध्यान आता है तो मन जाता है। मन है द्वार, संसार का। ध्यान है द्वार, मोक्ष का।*

मन से जिसे पाया है, ध्यान में वह खो जाता है। मन से जिसे खोया है, ध्यान में वह मिल जाता है।

*- ओशो*


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