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यमुना छठ : नीरु आशरा

यमुना छठ : Niru Ashra - Mumbai
🙏🏻 *श्री यमुनाजी* 🙏🏻
श्री यमुनाजी के नाम का महात्म्य तो हमने समझ लिया अब आप क्या क्या करते हैं अपने निज भक्तों के लिये उनको कौन कौन सी वस्तु का दान करते हैं अथवा कीमती वस्तु दुर्लभ पदार्थ का दान कर देते हैं देह जो जीवन जीने के लिये अत्यंत महत्व पूर्ण है उसे श्री यमुनाजी ही प्रदान करते हैं इंद्रियों को प्रभु लायक बना कर प्रभु के सनमुख आप श्री यमुनाजी ही रखते हैं इस जीव रूपी आत्मा को प्रभु परमात्मा की तरफ़ श्री यमुनाजी ही ले जाने में समर्थ हैं क्योंकि वेसे तो ये कभी भी अपने आप तो भगवान की तरफ़ अपने आपको मोडेगा नहीं तो हाथमें उस चिंतामणि रुप श्री ठाकुरजी को दान करते हैं जिससे भव सागर को यूं ही बिना श्रम के पार उतरा जा सकता है तो यहाँ गोविंद दासजी अपने दूसरे पद में कीर्तन में कहते हैं
*श्री यमुना सी नाहिं कोउ ओर दाता*
श्री यमुनाजी ने अपने प्राण प्रिय नंद नँदन श्री कृष्ण प्रभु श्री ठाकुरजी का दान अपने निज भक्त को किया है अपने पति को कोई स्त्री किसी को भी नहीँ दान करतीं परंतु यहाँ पर अलौकिक हे श्री वल्लभ प्रभु आप भी श्री स्वामिनी जी का स्वरूप हैं ओर आपने भी नंद नँदन भगवान श्री कृष्ण को ब्रह्म सम्बन्ध द्वारा ठाकुरजी को भक्त के हाथ में सौंपे हैं श्री यमुनाजी औऱ श्री वल्लभ प्रभु दोनों ही महान दाता हैं *श्री यमुना सी* अर्थात यम+उना यम राजा की छोटी बेहन श्री यमुनाजी आधिभौतिक स्वरूप में जल रुप हैं औऱ आध्यात्मिक स्वरूप में महात्म्य स्वरूप में आप यम राजा की बेहन हैं कलि में सब दोषों को निवृत करके प्रभु लायक देह देने से लेकर भक्त का स्वभाव प्रभु के लायक बना देना ये सब श्री यमुनाजी प्रदान करते हैं आधिदैविक स्वरूप तो आपका देवी के रुप में एवं श्री कृष्ण की चतुर्थ प्रिया श्री स्वामिनी जी हैं आप प्रभु के स्वभाव को भक्त के अनुकूल भी कर देतीं हैं इसीलिये उनके जेसा दान करने वाला कोई नहीँ है *नाहिं* नहीँ है ,कोई भी हो ही नहीँ सकता क्योंकि आप के जेसा दयालु कृपालु आप स्वयं ही हैं इसलिए *कोऊ* *ओर* कोई दूसरा श्री यमुनाजी जेसा दाता हो ही नहीँ सकता
जो गुणधर्म श्री ठाकुरजी में हैं वो ही श्री यमुनाजी में हैं इसलिये आपके दर्शन मात्र से ही श्री यमुनाजी प्रभु के स्वरूप को स्मरण करा देते हैं ओर आपका स्मरण करते ही आप ठाकुरजी के स्वरूप को दे देते हैं *नमामि यमुना महँ सकल सिध्धि हेतुं मुदा*
यहाँ पर श्री महप्रभुजी भी श्री यमुनाजी को सकल सिध्धि येह प्रभु से अलौकिक सम्बन्ध कराने वाली सिध्धि हैं वह प्रदान करने हेतु नमन करते हैं -
*जो इनकी शरण जात है दौर के ताहि को तिहि छिन कर सनाथा*
जो भी भक्त हो सुर भाव वाला असुर भाव वाला दैन्य भाव संयुक्त हो अथवा मान भाव से युक्त हो *जो* भी भक्त यहाँ श्री यमुनाजी तो सब के लिये हैं *अजाणे अधर्मी नहाई गयो तेनो माँ ए कर्यौ उध्धार*
परंतु यहाँ पर जो *इनकी* श्री यमुनाजी की *शरण* आपकी शरण में जाता है अर्थात आपका आश्रय लेकर बेठ जाता है वह केसे तो गोविंद दास जी केहते हैं कि *दौर के* अति ही आतुरता से ,अपना सब कुछ छोड़ कर ,बिना समय गंवाये जेसे एक छोटा सा बच्चा अपनी माँ की गोद में दौड़ कर आ जाता है उसी प्रकार यह भक्त जीव भी दौड़ कर श्री यमुनाजी की शरण ग्रहण करता है तब श्री यमुनाजी क्या करते हैं उसी दीन से उसी क्षण से *ताहि को* उस जीव भक्त को जो जीव शरण आया हुआ है यहाँ दोनों बात है जिन्होंने शरण मंत्र नाम सुना है उनकी भी बात हो रही है उस जीव को श्री यमुनाजी *तिहि छिन* अर्थात उसी क्षण वही पल में जा पल वो शरण आयो आप अपना लेती हैं जेसे माँ अपने बच्चे को गोद में उठा लेती है
*कर* अर्थात कर देतीं है क्या ?? तो केहते हैं कि दुनिया में जिसका कोई नहीँ वो अभागी है परंतु श्री यमुनाजी उस भक्त को जो शरण आया है सौभाग्यशाली बना देते हैं उसी क्षण *सनाथा* अर्थात सनाथ करना, श्री गोवर्धन नाथ जी रूपी सर्वस्व धन तो दे दिया आप श्री यमुनाजी ने आपके चरण रूपी शरण भी दी परंतु अब तो आप ऐसा करते हैं कि जो भी भक्त ठाकुरजी की शरण ग्रहण कर लेता है उसे आप अनाथ नहीँ रेहने देतीं उसे हमेशा के लिये अपना लेती है ओर सदा के लिये सनाथ कर देते हैं स का अर्थ है युक्त नाथ यानि श्रीनाथजी आप श्री यमुनाजी भक्त को श्री नाथजी से युक्त कर देते हैं श्री गोवर्धन नाथजी को उन भक्तों के साथ कर देते हैं ओर भक्त को श्री यमुनाजी एवं श्री ठाकुरजी दोनों का प्रेम स्नेह मिलता है ओर वो सनाथ हो जाता है उसी छिन ............ *श्याम सुंदर श्री यमुने महारानी की जय हो*
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