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गीता दर्शन -ओशो : हिरण वैष्णव

💫गीता दर्शन ओशो : हिरण वैष्णव अमदावाद
*लाओत्से ने चीन में कहा है, सीक, एंड यू विल लूज; खोजो, और तुमने खोया। सीक, एंड यू विल नाट फाइंड; खोजो, और तुम कभी न पा सकोगे। डू नाट सीक, एंड फाइंड; मत खोजो, और पा लो।*

अब यह सांख्य की निष्ठा है लाओत्से में। खोजो मत, और पा लो। बड़ी उलटी बात है। करीब-करीब ऐसे ही, जैसा मैंने सुना कि एक मछली ने जाकर मछलियों की रानी से पूछा कि सागर के संबंध में बहुत सुनती हूं, कहां है यह सागर? कहां खोजूं कि मिल जाए? कहां जाऊं कि पा लूं? कौन-सा है मार्ग? क्या है विधि? क्या है उपाय? कौन है गुरु, जिससे मैं सीखूं? यह सागर क्या है? यह सागर कहां है? यह सागर कौन है?

वह रानी मछली हंसने लगी। उसने कहा, खोजा, तो भटक जाओगी। गुरु से पूछा, कि उलझन हुई। विधि खोजी, तो विडंबना है। खोजो मत; पूछो मत। उस मछली ने कहा, लेकिन फिर यह सागर मिलेगा कैसे? तो उस रानी मछली ने कहा, सागर के मिलने की बात ही गलत है, क्योंकि सागर को तूने कभी खोया ही नहीं है। तू सागर ही है। सागर में ही पैदा होती है; सागर में ही बनती है; सागर में ही जीती है; सागर में ही विदा होती है; सागर में ही लीन। जो कुछ है, सागर ही है चारों तरफ। लेकिन उस मछली ने कहा, मुझे तो दिखाई नहीं पड़ता!

मछली को सागर दिखाई नहीं पड़ सकता, क्योंकि हम सिर्फ उसी को देख पाते हैं, जो कभी मौजूद होता है और कभी गैर-मौजूद हो जाता है। हम उसको नहीं देख पाते, जो सदा मौजूद है। सदा मौजूद दिखाई नहीं पड़ता।

जैसे हमें हवा दिखाई नहीं पड़ती, ऐसे ही मछली को सागर दिखाई नहीं पड़ता। न दिखाई पड़ने का कारण सिर्फ यही है कि सदा मौजूद है। हम जब आंख खोले, तब भी मौजूद था। जब हम आंख बंद करेंगे, तब भी मौजूद होगा। जो सदा मौजूद है, एवरप्रेजेंट है, वह अदृश्य हो जाता है। इसलिए परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता है। जो सदा मौजूद है, वह दिखाई नहीं पड़ सकता। दिखाई वही पड़ सकता है, जो कभी मौजूद है, और कभी गैर-मौजूद हो जाता है।

सांख्य की निष्ठा कहती है, कुछ मत करो। करने के भ्रम में ही मत पड़ो। न ध्यान, न धारणा, न योग–कुछ नहीं। कुछ करो ही मत। लेकिन न करना बहुत बड़ा करना है। बाकी सब करना बहुत छोटे-छोटे करना है। बाकी करना सब कर सकते हैं हम। न करना! प्राण कंप जाते हैं। कैसे न करो?

सबसे कठिन करना, न करना है। इसलिए सांख्य सबसे कठिन योग है। सांख्य के मार्ग से जो जाते हैं, वे राजऋषि हैं। जो उस योग को साध लेते हैं, न करने को, निश्चित ही वे ऋषियों में राजा हैं।

लेकिन जो नहीं साध पाते, उनके लिए फिर योग है–यह करो, यह करो, यह करो। ऐसा नहीं कि उस करने से उनको मिल जाएगा। लेकिन करने से थकेंगे, परेशान होंगे, कर-करके मुश्किल में पड़ेंगे; जन्म-जन्म भटकेंगे। आखिर में करने से इतने ऊब जाएंगे कि छोड़कर पटक देंगे और बैठ जाएंगे कि अब बहुत कर लिया; अब नहीं करते। और जब नहीं करेंगे, तब पा लेंगे।

लेकिन करने से गुजरना पड़ेगा उन्हें। उनका योग हठयोग है–जिद्द से, कर-करके। मिलता तो तब है, जब न करना ही फलित होता है, चाहे वह न करने से आया हो, और चाहे करने से आया हो। मिलता तो तभी है, जब न करना फलित होता है। पूर्ण अकर्म, तभी। और अकर्म में जो मिलता है, वह राजा जैसा मिलना है।

मजदूर को करना पड़ता है, तब भोजन मिलता है। दुकानदार को कुछ करना पड़ता है, तब भोजन मिलता है। राजा बैठा है अपने सिंहासन पर; कुछ करता नहीं; सब मिलता है। ऐसा कोई राजा होता नहीं। राजा को भी बहुत कुछ करना पड़ता है। लेकिन यह राजा की चरम धारणा है। राजऋषि का यहां जो अर्थ है, वह यही है कि जिसने बिना कुछ किए सब पा लिया, वह ऋषियों में राजा है।

और तीसरी बात, फिर हम सांझ बात करेंगे।

राजऋषि का एक तीसरा अर्थ भी खयाल में लेना जरूरी है। व्यक्ति में दो तरह के जीवन हो सकते हैं: तनाव से भरा, टेंस लिविंग; और रिलैक्स्ड, विश्रामपूर्ण, सहज। फूल देखें वृक्षों पर खिले, तो राजयोगी हैं। खिलने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता; खिल जाते हैं। आकाश में बादल देखें, तो राजयोगी हैं। कुछ करते नहीं; डोलते रहते हैं। कभी आकाश में देखी हो चील, परों को तिराकर रह जाती है थिर; पर भी नहीं हिलाती! डोलती है हवा पर। उड़ती नहीं, तिरती है। तैरती भी नहीं, तिरती है। बस, पंखों को फैलाकर रह जाती है। हवा जहां ले जाए; डोलती रहती है।


*➡गीता-दर्शन*

*🍁ओशो🍁👏👏👏👏👏*


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