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  • 🌸 "सत्य की महिमा" 🌸💫पोस्ट - 01 कुसुम सिंघानिया
    🌸 editor editor on Saturday, April 13, 2019 reviews [0]
    🌸 "सत्य की महिमा" 🌸💫पोस्ट - 01 कुसुम सिंघानिया
    एक सत्यवादी धर्मात्मा राजा थे। उनके नगर में कोई भी साधारण मनुष्य बिक्री करने के लिये बाजार में अन्न, वस्त्र आदि कोई वस्तु लाता और वह वस्तु यदि सायंकाल तक नहीं बिकती तो उसे राजा खरीद लिया करते थे। लोकहित के लिये राजा की यह सत्य प्रतिज्ञा थी। अत: सायंकाल होते ही राजा के सेवक शहर में भ्रमण करते और किसी को कोई वस्तु लिये बैठे देखते तो वे उससे पूछकर और उसके सन्तोष के अनुसार कीमत देकर उस वस्तु को खरीद लेते थे।
    एक दिन की बात है। स्वयं धर्मराज ब्राह्मण का भेष धारण करके घर की टूटी-फूटी व्यर्थ की चीजें, जो बाहर फेंकने योग्य कूड़ा-करकट थीं, एक पेटी में भरकर उन सत्यवादी धर्मात्मा राजा की परीक्षा करने के लिये उनके नगर में आये और बिक्री के लिये बाजार में बैठ गये, किन्तु कूड़ा-करकट कौन लेता ? जब सायंकाल हुआ, तब राजा के सेवक नगर में सदा की भाँति घूमने लगे। नगर में बेचने के लिये लोग जो वस्तुएँ लाये थे, वे सब बिक चुकी थीं। केवल ये ब्राह्मण अपनी पेटी के लिये बैठे थे। राजसेवकों ने इनके पास जाकर पूछा - ‘क्या आपकी वस्तु नहीं बिकी ?’ उन्होंने उत्तर दिया - ‘नहीं।’ राजसेवक ने पुन: पूछा - ‘आप इस पेटी में बेचने के लिये क्या चीज लाये हैं ? और उसका मूल्य क्या है ?’ ब्राह्मण ने कहा - ‘इसमें दारिद्रय (कूड़ा-करकट) भरा हुआ है। इसका मूल्य है एक हजार रूपये।’ यह सुनकर राजसेवक हँसे और उन्होंने कहा - ‘इस कूड़ा-करकट को कौन लेगा - जिसका एक पैसा भी मूल्य नहीं है ?’ ब्राह्मण ने कहा - ‘यदि इसे कोई नहीं लेगा तो मैं इसे वापस अपने घर ले जाऊँगा, राजसेवकों ने तुरन्त राजा के पास जाकर इसकी सूचना दी। इस पर राजा ने कहा - ‘उन्हें वस्तु वापस न ले जाने दो। मूल्य जो कुछ कम-से-कम हो सके, उन्हें सन्तोष कराकर वस्तु खरीद लो।’
    राजसेवकों ने आकर ब्राह्मण से उस पेटी को दो सौ रूपये मूल्य कहा, किन्तु ब्राह्मण ने एक हजार से एक पैसा भी कम लेना स्वीकार नहीं किया। राजसेवकों ने पाँच सौ रूपये तक देना स्वीकार कर लिया, परन्तु ब्राह्मण ने इन्कार कर दिया। तब राजसेवकों में से कुछ व्यक्ति उत्तेजित होकर राजा के पास आये और बोले - ‘महाराज ! उनकी पेटी में दारिद्रय (कूड़ा-करकट) भरा हुआ है, एक पैसे की भी चीज नहीं है और पाँच सौ रूपये देने पर भी वे नहीं दे रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में आपको उनकी वस्तु नहीं खरीदनी चाहिये।’ राजा ने कहा - ‘नहीं, हमारी सत्य प्रतिज्ञा है, हम सत्य का त्याग कभी नहीं करेंगे, इसलिये ब्राह्मण को, वे जो माँगे, देकर उस वस्तु को खरीद लो।’ यह सुनकर राजसेवक राजा के इस आग्रह को देखकर हँसे और लौट आये। उन्होंने निरुपाय होकर ब्राह्मण को एक हजार रूपये दे दिये और उनकी पेटी ले ली। ब्राह्मण रूपये लेकर चले गये और राजसेवक पेटी को राजा के पास ले आये। राजा ने उस दारिद्रय से भरी पेटी को राजमहल में रखवा दिया।
    रात्रि में जब शयन का समय हुआ, तब राजमहल के द्वार से वस्त्राभूषणों से सुसज्जित एक बहुत सुन्दर युवती निकली। राजा बाहर बैठक में बैठे हुए थे। उस स्त्री को देखकर राजा ने पूछा - ‘आप कौन हैं ? किस कार्य से आयी हैं ? और क्यों जा रही हैं ?’ उस स्त्री ने कहा - ‘मैं लक्ष्मी हूँ। आप सत्यवादी धर्मात्मा हैं, इस कारण मैं सदा से आपके घर में निवास करती रही हूँ, पर अब तो आपके घर में दारिद्रय आ गया है, जहाँ दारिद्रय रहता है वहाँ लक्ष्मी नहीं रहती। इसलिये आज मैं आपके यहाँ से जा रही हूँ।’ राजा बोले - ‘जैसी आपकी इच्छा।’
    क्रमशः

    लेखनी: श्रद्धेय 'श्रीजयदयालजी गोयन्दका'
    पुस्तक: 'उपदेशप्रद कहानियाँ' कोड-६८०
    प्रकाशक: गीताप्रेस, (गोरखपुर)

    "जय जय श्री राधे"🙏🏻💫
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