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  • Chief Editor : Manilal B. Par |  Executive Editor : Bipul A. Singh
  • संयुक्त परिवार : नीरु आशरा
    संयुक्त परिवार : नीरु आशरा editor editor on Monday, November 11, 2019 reviews [0]
    *गुम हो गए संयुक्त परिवार*
    *एक वो दौर था* जब पति,
    *अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*
    घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।
    पत्नी की *छनकती पायल और खनकते कंगन* बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।

    बाऊजी की बातों का.. *”हाँ बाऊजी"*
    *"जी बाऊजी"*' के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।

    *आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया*

    ये *"समय-समय"* की नही,
    *"समझ-समझ"* की बात है

    बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे
    *आज बड़े बैठे रहते हैं हम सिर्फ बीवी* से बात करते हैं

    दादाजी के कंधे तो मानो, पोतों-पोतियों के लिए
    आरक्षित होते थे, *काका* ही
    *भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*

    आज वही दादू - दादी
    *वृद्धाश्रम* की पहचान है,
    *चाचा - चाची* बस
    *रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*

    बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए
    जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।
    *'ताऊजी'*
    आज *सिर्फ पहचान* रह गए
    और,......
    *छोटे के बच्चे*
    पता नही *कब जवान* हो गये..??

    दादी जब बिलोना करती थी,
    बेटों को भले ही छाछ दे
    पर *मक्खन* तो
    *केवल पोतों में ही बाँटती थी।*

    *दादी ने*
    *पोतों की आस छोड़ दी*,
    क्योंकि,...
    *पोतों ने अपनी राह*
    *अलग मोड़ दी ।*

    राखी पर *बुआ* आती थी,
    घर मे नही
    *मोहल्ले* में,
    *फूफाजी* को
    *चाय-नाश्ते पर बुलाते थे।*

    अब बुआजी,
    बस *दादा-दादी* के
    बीमार होने पर आते है,
    किसी और को
    उनसे मतलब नही
    चुपचाप नयननीर बरसाकर
    वो भी चले जाते है ।

    शायद *मेरे शब्दों* का
    कोई *महत्व ना* हो,
    पर *कोशिश* करना,
    इस *भीड़* में
    *खुद को पहचानने की*,

    *कि*,.......

    *हम "ज़िंदा है"*
    या
    *बस "जी रहे" हैं"*
    अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया,
    *"शिक्षा के चक्कर में*
    *संस्कारों को ही भुला दिया"।*

    बालक की प्रथम पाठशाला *परिवार*
    पहला शिक्षक उसकी *माँ* होती थी,
    आज
    *परिवार* ही नही रहे
    पहली *शिक्षक* का क्या काम...??

    "ये *समय-समय* की नही,
    *समझ-समझ* की बात है"
    आजकल सब अकेले ही हैं झमेले के साथ।
    झूठ लगे तो माफ़ कीजिए आज की सच बात की है
    🙏🏻🙏🏻
                               

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