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  • Chief Editor : Manilal B. Par |  Executive Editor : Bipul A. Singh
  • Barsana : Kusum Singhania
    Barsana : Kusum Singhania editor editor on Sunday, April 21, 2019 reviews [0]
    *बरसाना*

    *श्री भाई जी की वाणी*

    *पुस्तक:---सत्संग के बिखरे मोती*

    *●सप्तम माला●*
    ••••••••••••••••••

    *1. )भेद-शास्त्र इसीलिये जगत् का कल्याण करते हैं कि उनमें भगवान् के गुण,महत्व, तत्व,रहस्य, स्वरूप,लीला,धाम और नाम आदि का विशद विवेचन है।*

    *2.)तीर्थ इसीलिए पतित पावन है कि उनमें भगवान् के प्यारे संतो ने निवास किया है।*

    *3.)भगवान् का नाम ऐसा अमृत है, जो किसी प्रकार के भाव कुभाव अभाव से जीभ के साथ छुए जाने पर मनुष्य का बलात् कल्याण कर देता है।*

    *4.)सच्चा वीर वही है, जो संसार-समर में जूझकर प्रकृति पर विजय पाता है और भगवान् के अमल अकल अनन्त आनन्द साम्राज्य को प्राप्त करता है।*

    *5.)भगवान् वही है, जिनका भगवच्चरणों में अनन्य अनुराग है।*

    *6.)जिस क्रिया से, अध्ययन से, स्थान से, संग से, भगवान् के भजन में बाधा होती है, वे सब अनर्थ हैं। इन अनर्थो की निवृत्ति होती है भजन से। अनर्थ के मिट जाने से निषाठा प्राप्त होती है अर्थात भगवान् से मन हटता ही नहीं। निष्ठा से रूची, रूची से प्रेम और प्रेम से आसक्ति उत्पन्न होती है।आसक्ति* *उत्पन्न होने के बाद फिर कुछ करना नहीं पड़ता, स्वत: भजन होता है।जब कामना वासना नष्ट हो जाती है। तब भाव उत्पन्न होता है। भाव के प्रकाश में साधना के सब विध्न मिट जाते हैं। ×××× परम भगवान् किसी व्यक्ति को श्रीकृष्ण के किसी भक्त की अथवा श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होने पर यह भाव श्रवण कीर्तन आदि साधना के बिना ही प्राप्त हो जाता है। ऐसा कहीं कहीं ही होता है। इसमें साधना नहीं करनी पड़ती, हठात् तरंग आती है, मन नाच उठता है और कामना वासना का नाश हो जाता है।*

    *7.)लोगों के देखने में वृन्दावन आठ कोस लम्बा तथा चार कोस चोडा है, पर भगवान् का धाम अचिन्त्य चिन्मय-स्वरूप है। उसके एक-एक धूलिकरण में अनन्तकोटि ब्रह्मांड का समावेश हो सकता है और है।*

    *8.)भगवान् के परम भक्त के सिवा विषयासक्ति का गुप्त अंकुर सबमें रहता है। उपर से तमाम घास जल जाने पर भी कहीं न कहीं जमीन के अन्दर कोई अंकुर रह ही जाता है। पर जो भगवान् के भक्त हो जाते हैं, उनमें कहीं भी विषयों का अंकुर नहीं रहता; क्योंकि उनका जिम्मा भगवान् ले लेते हैं। एक तो तैरकर जाय , एक को भगवान् हाथ पकड़कर ले जायँ, इन पिछले भक्तों को किसी प्रकार का डर नहीं। ज्ञान आदि के रहने पर तो शायद मनुष्य गिर जाय; पर जो भगवान् के भक्त है , वे गिर नहीं सकते क्योंक उनको जीवन के आरम्भ से ही भगवच्चरणों का आश्रय रहता है। वे सब बाधा-विध्नों के मस्तक पर चरण रखकर चलते हैं; उनकी रक्षा भगवान् करते हैं। योगी चाहे भ्रष्ट हो जाय, चाहे ज्ञानी पार न हो, पर भगवान् के वास्तविक चरणाश्रित भक्त को भगवान् अपने चरणों से, अपनी कृपा-डोरी से बांधे रखते हैं; वह कभी गिरता ही नहीं। वही वास्तव में परम अभय है। वहाँ पतन की अशंखा के लेश की भी गन्ध नहीं। वह श्रीकृष्ण की कृपा से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।*

    *9.)जो श्रीकृष्ण के अनुगत हो, वह जड़ पदार्थ भी परम पूजनीय है, पर जो श्रीकृष्ण के अपुगत न हो, वह देवता भी सर्वथा अपूजनीय है।*

    *10.)भगवान् की प्रकट लीला में जितने भी लीललासहचर वात्सल्य, मधुर एवं सख्यभाव रखने वाले है, वे सब के सब भगवान् के ही स्वरूप हैं; क्योंकि वे सभी भगवान् के पार्षद हैं। उनके द्वारा जो भी चेष्टा होती है, स्फुरणा होती है, वे जो कुछ भी करते हैं, करने की चेष्ठा करते है; सब भगवान् की इच्छा-शक्ति से समन्वित लीला शक्ति के द्वारा होता है तथा वह सब भगवान् की लीला का उपकरण है।*

    *11.)भगवान् की बाल लीलाएं ठीक प्राकृत बालकों की भांति होती है। उनमें अप्राकृत भाव देखने को नहीं मिलता। अप्राकृत का यह विचित्र प्राकृतानुकरण देखने में बड़ा मनोहर होता है ×××× जिनके संकल्प से अनन्त कोटी ब्रह्मांडों का संचालन होता है, उनकी प्राकृतलीला को देखकर यह भ्रम होना स्वाभाविक ही है कि ये सर्वेश है कि नहीं। ×××× यदि कोई उनके चरणों की शरण लेकर माधुर्य ग्रहण करना चाहे तो उसे ज्ञात होगा कि अप्राकृत की यह प्राकृत लीला कितनी मधुर है। भगवान् की भक्तवत्सलता एवं प्रेमाधीनता का यही पता लगया है। अखिल ब्रह्मांड पालक होकर भी वे अपने असीम ऐश्वर्य का जरा सा भी प्रकाश नहीं करते। बच्चों के साथ ठीक बच्चे होकर खेलते हैं। पर ऐसा नही मानना चाहिए कि वे कोई दम्भ करते है;वे सचमुच में ही खेलते हैं, सचमुच ही उन्हे इसमें आनन्द मिलता है। आनन्द को आनन्द देना, आनन्दमय में आनन्द की कामना --- स्पृहा उत्पन्न करना,यह भक्तों का ही काम है। आनन्द रस लेने के लिए ही भगवान् वात्सल्य सख्य आदि भक्तों के अनुरूप लीला करते हैं। अप्राकृत की लीला अप्राकृत है। पर देखने में प्राकृत सी लगती है। भक्तों को सुख हो भगवान् उसी प्रकार की लीलाएं करते हैं। भक्तों के सुख में उन्हें सुख होता है। उनकी श्रीकृष्ण आदि अवतारों की लीलाएं नहीं हैं;वे तो नित्य होती हैं और नित्य होती रहेंगी। यह नहीं कि पहले नहीं थीं अब प्रकट हुई हैं।भगवान् जिस प्रकार नित्य है उसी प्रकार उनकी लीलाएं भी नित्य हैं।इनमें मायिक जगत का काम नहीं। जो भक्त इनमें आनन्द लेते हैं, वास्तविक रूप में वे ही भगवान् हैं।*
                               

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