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  • " द्विमुखी पात्रं सूची " Niru Ashra - Mumbai
    editor editor on Monday, August 19, 2019 reviews [0]
    " द्विमुखी पात्रं सूची " Niru Ashra - Mumbai

    संप्रदाय में हम द्विमुखी पात्र का प्रयोग करते है। जिसके मुख्य तीन प्रकार है। तीनों में आकर भेद है परंतु शास्त्र सिद्धांत एक है।
    १. जल प्रभुको अरोगने के लिए धरते है तब झारीजी कहते है।
    २. हाथ खासा करने अर्थ जब वापरते है तब करवा कहते है।
    ३. प्रभुको भोजन बाद हस्त मुख प्रक्षालन याने अचवन के लिए वापरते है तब अचवन के झारी कहते है ।

    " द्विमुखी पात्रं सूची " शास्त्रवचन के अनुसार, जो पात्र को दो मुख है वह पवित्र है । उसमे धरा हुवा जल भी उत्तम और पवित्र बनता है। उत्तम जल होने पर प्रभु सुखार्थ संप्रदायमें प्रयोग में लाते है।

    ये झारीजी, मिट्टीकी या धातु ( तांबा, चांदी, सोने) की होती है।

    प्राचीन चित्रजी में हम देखते है की श्रीमहाप्रभुजी श्रीगुसांइजी श्रीहरिरायजी इत्यादि के बाजुमें झारीजी बिराजते है। आचार्य वर्ग भी जल पीनेमें झारी का प्रयोग करते थे । "जिसके ऊपर वस्र नहीं बिराजता था" यह विवेक है।

    वैष्णव भी झारी का प्रयोग जल पीने के लिये करते थे { देखो ८४/५० प्रसंग ३, २५२/१ प्रसंग २ }

    अचवन कराने में भी झारी का प्रयोग होता है । हाथ खासा करने के लिए "करवा" का प्रयोग होता है । यहाँ पवित्रता का और उत्तमताका ख्याल रखा गया है ।

    घर की सेवामें झारीजी छोटा और मंदिर , बैठक में बड़ा ऐसे कोई नियम नहीं है। हमें प्रसादी जल की कितनी आवश्यकता है और "यथा लाभ संतोष" के भीतर , मिट्टी की या धातु की , छोटी या बड़ी , ऋतु अनुसार उष्ण काल शीत काल, भगवद सुख को ध्यान में रखकर प्रयोग करना है । अधिक प्रसादी जल के लिए कुंजा या मटके का प्रयोग देखा गया है ।
    झरीजी पर लाल वस्त्र का नित्य नियम शुं प्रकार है, उष्णकाल में सफेद का आग्रह रखते है।
    अज्ञानतासे श्रीयमुनाजी कि साड़ी का भाव करते है यह गलत है। श्रीगिरधरबावा पंचम पीठाधीश्वर कहते थे कौन स्त्री को सतत गीली साड़ी पहनाता है या पहनती है ? अंदरका जल जो कुवा का या बोरका या मटकेका या नलका है उस जलमें उत्तम भाव यमुनाजी को करना है। गिला वस्त्र जल को ठंडा रखने हेतु है इस लिए शीत कालमें वस्त्र कोरा (सूखा) ही धरते है।

    😳 सावधानता 😳

    झारी या करवा या लोटी पकड़ते समय यह सावधानता रखनी जरूरी है की हाथ की पाँचो उँगलियों से नहीं पकडना है, पहेली उँगली☝�(�index finger) अलग रखके चारों से पकडना है। { पाँचों उँगलियों द्वारा पकडने पर निपटनेकी (toilet) जाने की मुद्रा हो जाती है यह अविवेक हो जाता है । }
    यह विवेक जल देते समय, गुरु, वैष्णवके साथ भी करना है।
                               

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