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  • 🌷 *भक्ति में व्याकुलता, भगवान से प्रेम ही वास्तविक सुख 🌷: Kusum Singhania
    🌷 *भक्ति में व्याकुलता, भगवान से प्रेम ही वास्तविक सुख 🌷: Kusum Singhania editor editor on Saturday, May 4, 2019 reviews [0]
    🌷 *भक्ति में व्याकुलता, भगवान से प्रेम ही वास्तविक सुख 🌷
    : Kusum Singhania Mumbai
    श्रीनामदेवजी के घर अखण्ड कीर्तन होता था। भगवान सूर्य के अस्ताचलगामी होते ही जनाबाई वहां आ जाती और एक कोने में बैठकर रात भर जागरण व कीर्तन करती। उसकी आंखों से प्रेमाश्रु बहते रहते।
    भगवान को रोना ही भाता है। जो उसके लिए जितना ही अधिक व्याकुल होकर रोता है, भगवान उससे उतना ही अधिक प्रसन्न होते हैं। आज तक भगवान के जितने भी प्रेमी हुए हैं सब भगवत्प्रेम में रोते ही रहे हैं।
    एक बार एकादशी की रात्रि नामदेवजी के घर में भक्तमण्डली कीर्तन कर रही थी। कोई मृदंग बजा रहा था, तो कोई करताल तो कोई झांझ बजा रहा था। कोई नाच रहा था, तो कोई गाते-गाते अश्रु बहा रहा था,
    कोई आनन्दमग्न होकर हंस रहा था–सभी भगवत्प्रेम में तन्मय, न किसी को तन-मन की सुधि है, न इस बात का ख्याल की कितनी रात बीत गयी। जनाबाई भी एक कोने में खड़ी प्रेममग्न होकर झूम रही थी।
    यही भक्तियोग है जिसके प्रभाव से मनुष्य के सारे बंधन कट जाते हैं और उसके जन्म-मृत्यु के बीजों का खजाना ही जल जाता है।
    संकीर्तन के आनन्दसागर में डूबे लोगों को पता ही नहीं चला कि कब उषाकाल हो गया। सभी लोग अपने-अपने घर चले गए। जनाबाई भी अपने घर आकर आराम करने लगी।
    भगवत्प्रेम की मादकता अभी उतरी नहीं थी, वह उसी में डूबी लेटी रह गई और उसकी आंख लग गई। जैसे ही आंख खुली, उसने देखा कि सूर्यदेव उदय हो गए हैं।
    वह स्वामी के गृहकार्य में देरी होने से घबराती हुई नामदेवजी के घर पहुंची और जल्दी-जल्दी हाथ का काम पूरा करने में लग गई। परन्तु बिलम्ब हो जाने से सभी कार्यों में हड़बड़ाहट होने लगी।
    काम कितने पड़े हैं–झाड़ू देना, बरतन साफ करना, कपड़े धोना, पानी भरना–ऐसा सोचते हुए जल्दी-जल्दी कपड़े धोने के लिए चन्द्रभागा नदी के किनारे गयी।
    वस्त्र पानी में डुबा भी नहीं पायी थी कि नामदेवजी का दूसरा काम याद आ गया और कपड़े छोड़कर भागती हुई नामदेवजी के घर की ओर चली।
    रास्ते में एक अपरिचित वृद्धा ने प्रेम से उसका आंचल पकड़ कर कहा–’कहां जा रही हो बेटी?’
    जल्दी में वृद्धा से आंचल छुड़ाते हुए जनाबाई ने कहा–’आज मुझे देर हो रही है, स्वामी की सेवा बाकी है।’ बुढ़िया ने प्रेम से कहा–’चिन्ता न कर, बेटी। कपड़े मैं साफ कर देती हूँ।’
    जनाबाई को नामदेवजी के घर पहुंचने की जल्दी थी पर न जाने क्यों बार-बार उसका मन बुढ़िया को याद कर रहा था। मां की तरह स्नेह उसे जीवन में पहली बार मिला था।
    नामदेवजी का काम खत्म करके जनाबाई नदी पर वापिस आई तो देखा कि बुढ़िया ने सारे कपड़े धोकर साफ कर दिए थे। इस वृद्धा ने कपड़ों के साथ ही उन कपड़ों के पहनने व धोने वालों के तन-मन भी निर्मल कर दिए थे।
    जनाबाई ने वृद्धा से कृतज्ञतापूर्ण स्वर में कहा–’बड़ा कष्ट उठाया आपने। तुम सरीखी परोपकारी माताएं ईश्वर का रूप होती हैं, मैं आपका आभार मानती हूँ।’ ‘इसमें आभार की कौन-सी बात है।’ ऐसा कहकर वृद्धा वहां से चली गयी।
    कभी आवश्यकता पड़ी तो मैं भी वृद्धा की सेवा करुंगी–ऐसा विचारकर जनाबाई वृद्धा का नाम-पता मालूम करने के लिए उसे ढूंढने लगी पर उसे निराशा ही हाथ लगी।
    जनाबाई कपड़े लेकर नामदेवजी के घर पहुंची। पर उसका मन वृद्धा के लिए बहुत व्याकुल था, वृद्धा ने जाते-जाते न मालूम क्या जादू कर दिया, जनाबाई कुछ समझ न सकी। जनाबाई ने गद्गद् कण्ठ से सारा प्रसंग नामदेवजी को सुना दिया।
    भगवद्भक्त नामदेवजी लीलामय की लीला समझ गए और प्रेम में मग्न होकर बोले–’जना! तू बड़भागिनी है,
    भगवान ने तुझ पर बड़ा अनुग्रह किया। वह कोई मामूली वृद्धा नहीं थी, वह तो साक्षात् नारायण थे जो तेरे प्रेमवश तेरे बिना बुलाए ही तेरे काम में हाथ बंटाने आए थे। यह सुनकर जनाबाई रोने लगी और भगवान को कष्ट देने के कारण अपने को कोसने लगी।
    भक्त का प्रेम ईश्वर के लिए महापाश है जिसमें बंधकर भगवान भक्त के पीछे-पीछे घूमते हैं। इस भगवत्प्रेम में न ऊंच है
    न नीच, न छोटा है न बड़ा। न मन्दिर है न जंगल। न धूप है न चैन। है तो बस प्रेम की पीड़ा; इसे तो बस भोगने में ही सुख है। यह प्रेम भक्त और भगवान दोनों को समान रूप से तड़पाता है....…!!
    कितना आनंद हैं इस प्रेम में जिसकी कोई कल्पना भी नही कर सकता ना ही कोई अपने शब्दों में व्यक्त "हे हरि.. तुम मुझे कब अपनाओगे....मुझे भी अपने चरण विन्दों मे स्थान दो।

    🌹 कबीर हंसना दूर कर, रोने से कर प्रीत। ♥
    ♥ बिन रोये क्यों पाइये, प्रेम पियारा मीत। 🌹

    Jay Shri Krishna 🙏🏻💫
                               

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