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  • Chief Editor : Manilal B. Par |  Executive Editor : Bipul A. Singh
  • कृष्ण : Niru Ashra -Mumbai
    कृष्ण : Niru Ashra -Mumbai editor editor on Saturday, December 15, 2018 reviews [0]
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    कृष्ण ....🈴 :Niru Ashra -Mumbai
    जब जब कृष्ण न बंसी बजाई
    तब तब राधा मन हर्षाई
    सखियों संग जमुना तट पहुँची
    पर कहीं दिखे न कृष्ण कन्हाई
    नटखट नंदगोपाल छुपे है
    कहीं भी नहीं वो हमको दिखे है

    राधा मंद मंद मुस्काई
    जान रही थे खेल रहे है
    उसको यूँ ही छेड़ रहे है
    तभी ग्वालो की टोली आयी
    सखिया दौड़ी आस लगाई
    नहीं कही गोपाल नहीं है
    क्यों है निष्ठुर बने कन्हाई ?

    राधा का मन व्याकुल ऐसा
    बिन चाँद चकोर के जैसा
    कान्हा कान्हा दरस दिखाओ
    मुरली की कोई तान सुनाओ

    जग को छोड़ा तुम्हारी खातिर
    जन्मो जन्मो युगों युगों
    रूप धरा तेरी कहलाई
    घर भी त्यागा सुख भी त्यागा
    मीरा बन पिया विष का प्याला
    फिर भी क्यों तुम परख रहे हो ?
    अब तो कान्हा दरस दे-रहो
    जाओ अब मैं भी न बोलू
    पलकों के पट मैं न खोलू
    रूठ गयी तो फिर न मिलूंगी
    बंसी की धुन मैं न सुनूंगी
    कान्हा का अब मन विचलित है
    कैसे रूठी राधा को मनाऊँ ?

    रूठो न राधा तुम ऐसे
    छेड़ रहा था मैं तो वैसे
    तुम सखी मेरी अति प्रिया हो
    बंसी अधर तुम लगी हिया हो
    अब जो तुम ऐसे रूठोगी
    बंसी भी मुझसे रूठेगी

    तुम कहो सौतन चाहे बैरन
    वो गाए बस तेरे कारन
    जो तुम रूठ गयी हो हमसे
    सुर उसके भी भूल गए है
    जाओ त्याग दिया अब उसको
    तुम बिन वो भी
                               

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