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  • गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड : अध्याय 14 KUSUM SINGHANIA
    गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड : अध्याय 14 KUSUM SINGHANIA editor editor on Sunday, November 20, 2016 reviews [0]
    गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड : अध्याय 14
    गंताक से आगे:- By Kusum Singhania (Mumbai)
    श्री नारद जी कहते हैं:- बालक श्रीकृष्ण के घर आ जाने पर नन्द आदि गोप और गोपियाँ- सभी को बड़ा हर्ष हुआ, वे सब लोगों के साथ उसकी कुशल वार्ता कहने लगे।
    यशोदा जी बालक श्रीकृष्ण को उठा ले गयीं और बार-बार स्तन्य पिलाकर, मस्तक सूँघ कर और आँचल से छाती में छिपा कर छोह-मोह के वशीभूत हो, रोहिणी से कहने लगीं।
    श्री यशोदा जी बोलीं:- बहिन, मुझे दैव ने यह एक ही पुत्र दिया है, मेरे बहुत से पुत्र नहीं है; इस एक पुत्र पर भी क्षण भर में अनेक प्रकार के अरिष्ट आते रहते हैं।
    आज यह मौत के मुँह से बचा है, इससे अधिक उत्पात और क्या होगा?
    अत: अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ तथा अब और कहाँ रहने की व्यवस्था करूँ?
    धन, शरीर, मकान, अटारी और विविध प्रकार के रत्न- इन सबसे बढ़कर मेरे लिये यह एक ही बात है कि मेरा यह बालक कुशल से रहे।
    यदि मेरा यह बच्चा अरिष्टों पर विजयी हो जाय तो मैं भगवान श्री हरि की पूजा, दान एवं यज्ञ करूँगी; तड़ागवापी आदि का निर्माण करूँगी और सैकड़ों मन्दिर बनवा दूँगी।
    प्रिय रोहिणी, जैसे अन्धे के लिये लाठी ही सहारा है, उसी प्रकार मेरा सारा सुख इस बालक से ही है।
    अत: बहिन, अब मैं अपने लाला को उस स्थान पर ले जाऊँगी, जहाँ कोई भय न हो।
    श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, उसी समय नन्द मन्दिर में बहुत से विद्वान ब्राह्मण पधारे और उत्तम आसन पर बैठे, नन्द और यशोदा जी ने उन सबका विधिवत पूजन किया।
    महाभाग ब्राह्मण बोले:- व्रजपति नन्द जी तथा व्रजेश्वरी यशोदे, तुम चिंता मत करो।
    हम इस बालक की कवच आदि से रक्षा करेंगे, जिससे यह दीर्घजीवी हो जाये।
    श्री नारद जी कहते हैं:- राजन, उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कुशाग्रों, नूतन पल्लवों, पवित्र कलशों, शुद्ध जल तथा ऋक, यजु एवं सामवेद के स्तोत्रों और उत्तम स्वस्तिवाचन आदि के द्वारा विधि-विधान से यज्ञ करवाकर अग्नि की पूजा करायी।
    तब उन्होंने बालक श्रीकृष्ण की विधिवत रक्षा की (रक्षार्थ निम्नांकित कवच पढ़ा)।
    ब्राह्मणा उवाच:-
    दामोदर: पातु पादौ जानुनी विष्ट रश्रवा:।
    ऊरू पातु हरिर्नाभिं परिपूर्णतम: स्वयम्॥
    कटिं राधापति: पातु पीतवासास्वो्ट यदरम्।
    हृदयं पद्मनाभश्र्च भुजौ गोवर्धनोद्धर:॥
    मुखं च मथुरानाथो द्वारकेश: शिरोअवतु।
    पृष्ठंव पात्व सुरध्वंरसी सर्वतो भगवान् स्ववयम्॥
                               

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