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  • ओशो—( आरेंज बुक ) ध्यान के प्रकार : By Hiran Vaishnav
    ओशो—( आरेंज बुक ) ध्यान के प्रकार :  By Hiran Vaishnav editor editor on Friday, October 28, 2016 reviews [0]
    ओशो—( आरेंज बुक ) ध्यान के प्रकार : By Hiran Vaishnav
    ध्यान को उनके करने की विधि और उनके ध्यान लगाने वाले केंद्र के अनुसार कई भागो में बांटा गया है जो निम्नलिखित है -
    निराकार ध्यान :
    ध्यान करते समय देखने को ही लक्ष्य बनाएं। दूसरे नंबर पर सुनने को रखें। ध्यान दें, गौर करें कि बाहर जो ढेर सारी आवाजें हैं उनमें एक आवाज ऐसी है जो सतत जारी रहती है आवाज, फेन की आवाज जैसी आवाज या जैसे कोई कर रहा है ॐ का उच्चारण। अर्थात सन्नाटे की आवाज। इसी तरह शरीर के भीतर भी आवाज जारी है। ध्यान दें। सुनने और बंद आंखों के सामने छाए अंधेरे को देखने का प्रयास करें। इसे कहते हैं निराकार ध्यान।
    रोगोपचार की दृष्टि से उपयोगी अन्य प्राणायाम |
    आकार ध्यान :
    आकार ध्यान में प्रकृति और हरे-भरे वृक्षों की कल्पना की जाती है। यह भी कल्पना कर सकते हैं कि किसी पहाड़ की चोटी पर बैठे हैं और मस्त हवा चल रही है। यह भी कल्पना कर सकते हैं कि आपका ईष्टदेव आपके सामने खड़ा हैं। 'कल्पना ध्यान' को इसलिए करते हैं ताकि शुरुआत में हम मन को इधर उधर भटकाने से रोक पाएं।
    होशपूर्वक जीना :
    क्या सच में ही आप ध्यान में जी रहे हैं? ध्यान में जीना सबसे मुश्किल कार्य है। व्यक्ति कुछ क्षण के लिए ही होश में रहता है और फिर पुन: यंत्रवत जीने लगता है। इस यंत्रवत जीवन को जीना छोड़ देना ही ध्यान है।जैसे की आप गाड़ी चला रहे हैं, लेकिन क्या आपको इसका पूरा पूरा ध्यान है कि 'आप' गाड़ी चला रहे हैं। आपका हाथ कहां हैं, पैर कहां है और आप देख कहां रहे हैं। फिर जो देख रहे हैं पूर्णत: होशपूर्वक है कि आप देख रहे हैं वह भी इस धरती पर। कभी आपने गूगल अर्थ का इस्तेमाल किया होगा। उसे आप झूम इन और झूम ऑउट करके देखें। बस उसी तरह अपनी स्थिति जानें। कोई है जो बहुत ऊपर से आपको देख रहा है। शायद आप ही हों।
    "सिरदर्द को देखना—( ध्यान )"
    अब जब भी आपको सिरदर्द हो तो एक छोटी सी ध्यान की विधि का प्रयोग करें—सिर्फ प्रयोगात्मपक रूप से—बाद में आप बड़ी बीमारियों में और लक्षणों में भी प्रयोग कर सकते है।
    जब भी आपको सिरदर्द हो, एक छोटा सा प्रयोग करें। शांत बैठ जाएं और उसे देखें, अच्छी तरह से देखें—दुश्मन की तरह नहीं। यदि आप उसे अपने दुश्मन की तरह देखेंगे, तो अच्छे से नहीं देख पाएंगे। आप देखने से बचेंगे। कौन अपने दुश्मन को देखना चाहता है? हर कोई बचता है। शांत बैठ जाएं और सि‍रदर्द को देखें—बिना किसी भाव के कि वह रूक जाए, बिना किसी इच्छा के, कोई संघर्ष नहीं, कोई लड़ाई नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं। शांति से देखते रहें, ताकि यदि वह आपको कुछ कहना चाहे तो कह सके। उसमें कोई सांकेतिक संदेश है। अगर आप शांति से देखते रहे तो चकित हो जाएंगे। पहली बात—जितना ज्यादा आप देखोगे, उतना ज्यादा वह तेज होगा। और आप थोड़े उलझन में पड़ेंगे—यदि सिरदर्द तेज हो रहा है तो यह विधि कैसे मदद करेगी। यह तेज हो रहा है, क्योंकि पहले आप उसे टाल रहे थे। सि‍रदर्द तो उतना ही था, लेकिन आप उसे टाल रहे थे, दबा रहे थे—एस्प्रोस के बिना भी उसे दबा रहे थे। जब आप उसे देखते है तो दमन हट जाता है। और सि‍रदर्द अपनी सहज तीव्रता में प्रकट होता है। अब आप उसे खुले कानों से रूई ड़ाले बिना सुन रहे है। पहली बात: वह तेज हो जाएगा। यदि वह तेज हो रहा है तो आप संतुष्ट हो सकते है कि आप ठीक से देख रहे है। यदि तेज नहीं हो रहा है तो अभी आप देख नहीं रहे है; अभी आप टाल रहे है। दूसरी बात—वह एक बिंदु पर सिमट आएगा; वह बड़ी जगह पर फैला हुआ नहीं रहेगा। पहले आपको लगता था कि मेरा पूरा सिर दुःख रहा है। अब आप देखेंगे कि पूरा सिर नहीं, केवल थोड़ी सी जगह पर दर्द है। यह भी एक संकेत है कि आप और भी गहराई से उसे देख रहे है। दर्द कि फैली हुई अनुभूति एक चालाकी है—यह भी उसे टालने का एक ढ़ंग रहा है। दर्द यदि एक ही बिंदु पर हो तो वह और भी तीव्र होगा। तो हम एक भ्रम पैदा करते है कि पूरा सर ही दुःख रहा है। उसे देखें—और वह छोटी से छोटी जगह में सिमटता जाएगा। और एक क्षण आएगा जब वह सुई की नोक जितनी जगह पर सिमट आएगा—अत्यंत घनीभूत, अत्य धिक पैना, बहुत तेज। आपने ऐसा सिरदर्द कभी नहीं जाना होगा। लेकिन बहुत ही छोटी जगह पर सीमित। उसे देखते रहें।
    और फिर तीसरी और सबसे महत्वेपूर्ण घटना घटेगी। यदि आप तब भी देखते ही रहे जब दर्द बहुत तीव्र और सीमित और एक ही बिंदु पर केंद्रित है, तो आप कई बार देखेंगे कि वह खो गया है। जब आपका देखना पूर्ण होगा तो वह खो जाएगा। ओ जब वह खो जाएगा तब उसकी झलक मिलेगी कि वह कहां से आ रहा है—क्याए कारण है। जब प्रभाव खो जाएगा तो आप कारण को देख सकेंगे। ऐसा कई बार होगा फिर सिरदर्द वापस आ जाएगा। जब भी आपकी दृष्टि समग्र होगी, वह खो जाएगा। और जब वह खोता है तो उसके पीछे छिपा हुआ ही उसका कारण होता है। और आप हैरान हो जाएंगे—आपका मन कारण बताने के लिए तैयार है। और एक हजार एक कारण हो सकते है। सबसे वही अलार्म दि‍या जाता है, क्योंकि अलार्म देने कि प्रणाली सरल है। आपके शरीर में बहुत अलार्म नहीं है। अलग-अलग कारणों के लिए वही अलार्म, वही चेतावनी दी जाती है। हो सकता है हाल ही में आपको क्रोध आया हो और आपने उसे अभिव्यक्तव न किया हो। अचानक वह क्रोध प्रकट होगा। आप देखेंगे अपका सारा क्रोध जो आप मवाद की तरह भीतर ढ़ो रहे है। अब यह भारी हो गया है और यह क्रोध निकलना चाहता है। उसे रेचन की आवश्य़कता है। तो उसे निकाल दें, उसका रेचन कर दें। और तत्क्षाण आप देखेंगे कि सिरदर्द गायब हो गया है। और न एस्प्रोा की जरूरत है, न किसी चिकित्सार की।
    ओशो—( आरेंज बुक )
    ध्यान के प्रकार :😌✨
    ध्यान को उनके करने की विधि और उनके ध्यान लगाने वाले केंद्र के अनुसार कई भागो में बांटा गया है जो निम्नलिखित है -
    -भृकुटी ध्यान ( Third Eye Meditation ) : इसे तीसरी आँख पर ध्यान केन्द्रित करने वाला ध्यान माना जाता है. इसके लिए व्यक्ति को अपनी आपको को बंद करके, अपना सारा ध्यान अपने माथे की भौहो के बीच में लगाना होता है. इस ध्यान को करते वक़्त व्यक्ति को बाहर और अंदर पुर्णतः शांति का अनुभव होने लगता है. इन्हें अपने माथे के बीच में ध्यान केन्द्रित कर अंधकार के बीच में स्थित रोशनी की उस ज्वाला की खोज करनी होती है जो व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने का मार्ग दिखाती है. जब आप इस ध्यान को नियमित रूप से करते हो तो ये ज्योति आपके सामने प्रकट होने लगती है, शुरुआत में ये रोशनी अँधेरे में से निकलती है, फिर पीली हो जाती है, फिर सफ़ेद होते हुए नीली हो जाती है और आपको परमात्मा के पास ले आती है.

    -श्रवण ध्यान ( Listening / Nada Meditation ) : इस ध्यान को सुन कर किया जाता है, ऐसे बहुत ही कम लोग है जो इस ध्यान को करके सिद्धि और मोक्ष के मार्ग पर चलते है. सुनना बहुत ही कठिन होता है क्योकि इसमें व्यक्ति के मन के भटकने की संभावनाएं बहुत ही अधिक होती है. इसमें आपको बाहरी नही बल्कि अपनी आतंरिक आवाजो को सुनना होता है, इस ध्यान की शुरुआत में आपको ये आवाजे बहुत धीमी सुनाई देती है और धीरे धीरे ये नाद में प्रवर्तित हो जाती है. एक दिन आपको ॐ स्वर सुनाई देने लगता है. जिसका आप जाप भी करते हो.
    ध्यान के विभिन्न प्रकार

    -प्राणायाम ध्यान ( Breath Focus Meditation ) : इस ध्यान को व्यक्ति अपनी श्वास के माध्यम से करता है, जिसमे इन्हें लम्बी और गहरी साँसों को लेना और छोड़ना होता है. साथ ही इन्हें अपने शरीर में आती हुई और जाती हुई साँसों के प्रति सजग और होशपूर्ण भी रहना होता है. प्राणायाम ध्यान बहुत ही सरल ध्यान माना जाता है किन्तु इसके परिणाम बाकी ध्यान के जितने ही महत्व रखते है।

    -मंत्र ध्यान (Mantra Meditation ) : इस ध्यान में व्यक्ति को अपनी आँखों को बंद करके ॐ मंत्र का जाप करना होता है और उसी पर ध्यान लगाना होता है. क्योकि हमारे शरीर का एक तत्व आकाश होता है तो व्यक्ति के अंदर ये मंत्र आकाश की भांति प्रसारित होता है और हमारे मन को शुद्ध करता है. जब तक हमारा मन हमे बांधे रखता है तब तक हम इस ध्वनि को बोल तो पाते है किन्तु सुन नही पाते लेकिन जब आपके अंदर से इस ध्वनि की साफ़ प्रतिध्वनि सुनाई देने लगती है तो समझ जाना चाहियें कि आपका मन साफ़ हो चूका है. आप ॐ मंत्र के अलावा सो-ॐ, ॐ नमः शिवाय, राम, यम आदि मंत्र का भी इस्तेमाल कर सकते हो.

    -तंत्र ध्यान ( Tantra Meditation ) : इसमें व्यक्ति को अपने मस्तिष्क को सिमित रख कर, अपने अंदर के आध्यात्म पर ध्यान केन्द्रित करना होता है. इसमें व्यक्ति की एकाग्रता सबसे अहम होती है. इसमें व्यक्ति अपनी आँखों को बंद करके अपने हृदय चक्र से निकलने वाली ध्वनि पर ध्यान लगता है. व्यक्ति इसमें दर्द और सुख दोनों बातो का विश्लेषण करता है.

    -योग ध्यान ( Yoga Meditation ) : क्योकि योग का मतलब ही जोड़ होता है तो इसे करने का कोई एक तरीका नही होता बल्कि इस ध्यान को इनके करने की विधि के अनुसार कुछ अन्य ध्यानो में बांटा गया है. जो निम्नलिखित है -

    •चक्र ध्यान ( Chakra Meditation ) : व्यक्ति के शरीर में 7 चक्र होते है, इस ध्यान को करने का तात्पर्य उन्ही चक्रों पर ध्यान लगाने से है. इन चक्रों को शरीर की उर्जा का केंद्र भी माना जाता है. इसको करने के लिए भी आँखों को बंद करके मंत्रो (लम, राम, यम, हम आदि) का जाप करना होता है. इस ध्यान में ज्यादातर हृदय चक्र पर ध्यान केन्द्रित करना होता है.

    •दृष्टा ध्यान (Gazing meditation ) : इस ध्यान को ठहराव भाव के साथ आँखों को खोल कर किया जाता है. इससे अर्थ ये है कि आप लगातार किसी वास्तु पर दृष्टी रख कर ध्यान करते हो. इस स्थिति में आपकी आँखों के सामने ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पनायें आती है. इस ध्यान की मदद से आप बौधिक रूप से अपने वर्तमान को देख और समझ पाते हो.

    •कुंडलिनी ध्यान ( Kundalini Meditation ) : इस ध्यान को सबसे मुश्किल ध्यान में से एक माना जाता है. इसमें व्यक्ति को अपनी कुंडलिनी उर्जा को जगाना होता है, जो मनुष्य की रीढ़ की हड्डी में स्थित होती है. इसको करते वक़्त मनुष्य धीरे धीरे अपने शरीर के सभी आध्यात्मिक केन्द्रों को या दरवाजो को खोलता जाता है और एक दिन मोक्ष को प्राप्त हो जाता है. इस ध्यान को करने के कुछ खतरे भी होते है तो इसे करने के लिए आपको एक उचित गुरु की आवश्यकता होती है.
                               

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